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ललित जैन मालवा न्यूज रानापुर मुमुक्षु परिधि सालेचा का वर्षीदान का वरघोड़ा सकल जैन श्वेतांबर श्री संघ के द्वारा श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय से आचार्य दिव्यानंद विजय जी आदि ठाना एवं साध्वी श्री स्वर्णलता श्रीजी की निश्रा में निकाला गया । बैंड के सुमधुर भक्ति गीतों के साथ वर्षीदान का वरघोड़ा मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय से प्रारंभ होकर पूरे नगर से के प्रमुख मार्गो से गुजरा । जैन अज़ैन अनेक घरों से दीक्षार्थी का बहुमान किया गया । दीक्षार्थी परिधि ने वर्षीदान में रुपया,पैसा,चांदी के आभूषण, कपड़े,सौंदर्य सामान आदि लोगों को दान किया । समाजजनों ने उत्साह के साथ दीक्षार्थी की जय जय कार की । विशाल जुलूस में सबसे आगे आचार्य भगवंत,समाजजन और महिलाएं कलश लेकर चल रही थी । सबसे पीछे दीक्षार्थी एक रथ में सवार वर्षीदान कर रही थी । जुलूस पूरे नगर के प्रमुख मार्गो से गुजरता हुआ पुनःश्री चारित्र आराधना भवन पहुंचा । यहां मुनिश्री वैराग्य नन्द जी अपने प्रवचन में कहा कि आत्मकल्याण के लिए संयंम लेना आवश्यक। तीर्थंकर चक्रवर्ती गणधर तक को संयम लेना पड़ा। सिंधु प्रकरण में बताया की संसार को छोड़ने की भावना रखने वाला श्रावक होता है।सम्यक दर्शन आने के बाद ही आत्मा मोक्ष गामी बनती हैं।आत्मा को ज्ञान होने के बाद ही संसार से अरुचि होती हैं वह संयंम पथ पर अग्रसर होती है। आचार्य दिव्यानंद जी कहा कि महावीर के अहिंसा पथ को अपनाए बिना विश्व शांति संभव नही। दो प्रकार के तप बाह्य और अभ्यन्तर अरिहन्त को नही जानने वालो आत्मा उनकी आज्ञा को नही जानते जो आत्मा परमात्मा के वचन में श्रद्धा और विश्वास रखने वाली आत्मा ही मोक्ष जाती है।अरी को नही पहचान ने वाली आत्मा अरिहन्त को नही जानती । तीर्थंकर ने विनय को सभी धर्म का मूल बताया है।विनय बिना धर्म टिकता नही है। अनुमोदना उद्बोधन श्रीसंघ अध्यक्षद्वय चंद्रसेन कटारिया एवं दिलीप सकलेचा ने दिया । यहां दिक्षार्थी का बहुमान श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय,श्री आदिनाथ ओसवाल समाज,श्री नाहर परिवार,श्री राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद,महिला परिषद आदि की और से किया गया । कार्यक्रम का संचालन जितेंद्र सालेचा ने किया ।

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