जन्म मरण के बंधन से मुक्ति हेतु सर्वश्रेष्ठ साधन श्रीमद् भागवत कथा – शास्त्री जी
गोपाल मंदिर में भागवत कथा का समापन

मालवा न्यूज राणापुर (ललित जैन
रविवार को चन्द्र ग्रहण होने से सभी मंदिरों में भागवत कथा की पूर्णाहुति दिन में 11 बजे ही हो गई । भागवत कथा के अंतिम दिन माहेश्वरी समाज के गोपाल मंदिर में कथा का वाचन करते हुए पौराणिक प्रेम नारायण कृष्ण शास्त्री धुलेट वाले ने कहा कि जन्म मरण के बंधन से मुक्ति हेतु सर्वश्रेष्ठ साधन श्रीमद् भागवत कथा है ।उदाहरण देते हुए उन्होंने श्री सुदामा चरित्र श्रवण कराया गया एवं परीक्षित का मोक्ष का कलिकाल का वर्णन करते हुए कहा कि हमें सदैव परोपकारी सद्भावना से युक्त होकर छल कपट से रहित होकर धर्म को धारण करना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा निश्चित रूप से हम सभी समाज का
अतः हम सभी के जीवन का प्रधान उद्देश्य ‘धर्म की सेवा’ है। यह धर्म की पूजा के लिये ही शरीर धारण किया हुआ है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें जीवित रहना है। जिसका प्राण ही धर्म में पिरोया हुआ हो, वह अपने इष्ट पर इस प्रकार की आपत्ति आते देखकर, उसे लाँछित और तिरस्कृत होते देखकर, मार्मिक वेदना का अनुभव करती है “प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक बने” यह उपदेश करने के साथ हम धर्म के वर्तमान स्वरूप में शोधन भी करना चाहते हैं। आज़ इतनी कथा आयोजन होने के बाद भी लोगों में भावना कुत्सित मानसिकता बढ़ती जा रही है छल कपट राग दैष बढ़ रहा है मानव आज दानव बन रहा है
हम अनुभव करते हैं कि सदियों की पराधीनता गरीबी और अज्ञान ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को बहुत ही विकृत, दोषपूर्ण, एवं जर्जरित कर दिया है। अनेक छिद्रों के कारण उसका वर्तमान स्वरूप छलनी की तरह छिरछिरा हो गया है, जिससे राष्ट्र की उच्चतम सद्भावनाओं के साथ डाली हुई पञ्चमाँश शक्ति नीचे गिर पड़ती है और छलनी में दूध दुहने वाले के समान केवल पश्चात्ताप और निराशा ही प्राप्त होती है। सद्भावना से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिए जो लोकोपकारी कार्य किये जाते हैं, वे धर्म कहलाते हैं।” धर्म की इस मूलभूत आधार शिला के ऊपर हमें देश काल की स्थिति के अनुसार नवीन कर्मकाँडों की रचना करनी होगी। दूध रखने के लिये छेदों वाले बर्तन को हटाना होगा, जिसमें से कि सारा दूध चू कर मिट्टी में मिल जाता है। ईश्वर की सच्ची उपासना उसकी चलती फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करने में है। परमार्थ की वेदी पर अपने निजी तुच्छ स्वार्थों को बलिदान करना धर्म हैं। धर्म और ईश्वर की सच्चे अर्थों में पूजा करने वाले व्यक्तियों का कार्य-क्रम वर्तमान परिस्थितियों में अपने आस-पास छाये हुए अज्ञान और दारिद्र के घोर अन्धकार को दूर हटाना होगा। अविद्या के कारण हमारी मानवीयता अंधेरे में टकराती फिर रही है, दरिद्रता के कारण हमारा देश पशुओं से भी गया बीता दयनीय जीवन बिता रहा है।जिसके हृदय में धर्म हैं, उसके हृदय में दया करुणा और प्रेम के लिये स्थान अवश्य होगा। जो व्यक्ति धर्म के नाम पर माला तो सारे दिन जपता है, पर बीमार पड़ौसी की सेवा के लिये आधा घंटा की भी फुरसत नहीं पाता, हमें संदेह होगा कि वह कहीं धर्म की विडम्बना तो नहीं कर रहा है।आज हम चारों ओर भयंकर दावानल सुलगती हुई देखते हैं। महायुद्ध का दानव लाखों मनुष्यों को अपनी कराल दाढ़ों के नीचे कुचल कुचल कर चबाते जा रहा है। खून से पृथ्वी लाल हो रही है। आकाश से ऐसी अग्नि वर्षा हो रही है जिससे सहस्रों निरपराध प्राणी अकारण ही चबाने की तरह जल-भुन रहे हैं। कराह और चीत्कारों से सारा आकाश मण्डल गुँजित हो उठा है।आज़ इस दोर में महंगी का तो कुछ कहना ही नहीं, हर चीज पर चौगुने आठ गुने दाम बढ़ते जा रहे हैं। पैसा खर्च करने पर भी वस्तुएं प्राप्त होती नहीं। अच्छा अब हटता जा रहा है आज सभी , खाद्य पदार्थों का लोप होता जाता है। व्यापार चौपट हो रहे हैं, उद्योग धंधे बढ़ते नहीं, बेकारी में कमी नहीं होती खर्च बढ़ रहे हैं पर आमदनी नहीं बढ़ती आधे पेट खाने वालों और आधे अंग ढकने वालो की संख्या बढ़ती जा रही है। जी तोड़ परिश्रम करने पर भी भोजन वस्त्र की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती। कुछ अमीरों या युद्ध सम्बन्धी कोई व्यवसाय प्राप्त कर लेने वाले भाग्यवानों की बात अलग है, किन्तु साधारण जनता की जीवन निर्वाह समस्या दिन-दिन गिरती चली जा रही है, तिल तिल करके अभावों की ज्वाला में लोगों को झुलसना पड़ रहा है।
दुर्बुद्धि तथा दुष्प्रवृत्तियों से छूटना ही मुक्ति है “मुक्ति” जीवन का परम पुरुषार्थ है। यह केवल मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाली कोई स्थिति नहीं, बल्कि जीवन रहते ही दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से मुक्ति पाकर भी पाई जा सकती है। जब मनुष्य अपने अंदर के लोभ, मोह, शत्रुता से मुक्त होता है, तब वह सच्चे आनंद, शांति और संतुलन का अनुभव करता है। ऐसा व्यक्ति किसी को दुख नहीं देता और न ही किसी से दुखी होता है। उसका आचरण मधुर, विचार गहरे और व्यवहार लोकहितकारी होता है। वह मुक्त जीवन जीता है और सबका प्रिय बन जाता है । अंतिम दिवस समाज के अध्यक्ष सुरेश राठी व सचिव कमलेश माहेश्वरी द्वारा समापन भाषण एवं आभार व्यक्त किया ।
